बिहार में इस बार नीतीश को निपटाना भाजपा के लिए क्यों आसान 

बिहार या बिहार की राजनीति को थोड़ा-बहुत समझने वालों के लिए यह कोई ‘रहस्योद्घाटन’ नहीं कि नवम्बर, 2025 के चुनाव में अगर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) को बहुमत मिला तो भारतीय जनता पार्टी नीतीश कुमार के स्थान पर अपने किसी नेता को मुख्यमंत्री बनाना चाहेगी। यानी 2025 को नीतीश कुमार की लंबी राजनीतिक पारी का समापन वर्ष भी माना जा सकता है। भाजपा किसी बड़ी मजबूरी में ही अब नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री के रूप में स्वीकार करेगी। 

हाल ही में एक टीवी चैनल पर भाजपा के शीर्ष रणनीतिकार और गृह मंत्री अमित शाह द्वारा की गई टिप्पणी से भी इसके संकेत मिलते हैं! भारतीय जनता पार्टी यह तो मान रही है कि यह चुनाव नीतीश कुमार के नेतृत्व में लड़ा जा रहा है लेकिन वह राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) की तरफ से मुख्यमंत्री का चेहरा या उम्मीदवार नहीं हैं। अगर गठबंधन को बहुमत मिला तो सभी घटक दलों के विधायक ही नेता या मुख्यमंत्री का चुनाव करेंगे। 

अमित शाह ने जो कुछ कहा, वैधानिक रूप से वह सही है। गठबंधन में मुख्यमंत्री पद के चयन की लोकतांत्रिक प्रक्रिया यही होनी चाहिए। लेकिन भाजपा के अंदर और  भाजपा के बाहर हर राजनैतिक व्यक्ति को यह बात मालूम है कि किसी भी भाजपा या एनडीए शासित राज्य में नये मुख्यमंत्री के नाम का फैसला मुख्यत: दो लोग करते हैं: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह। हां, उक्त नाम पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत की सहमति लेना जरूरी होता है।

बिहार में भी ऐसा ही होगा। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अब बिहार में अपनी विचारधारा या अपनी पसंद का मुख्यमंत्री चाहता है। इसलिए 2025 के चुनाव में भाजपा-जद (यू) गठबंधन के बहुमत पाने की स्थिति में नीतीश कुमार के फिर से मुख्यमंत्री की संभावना नहीं के बराबर है। अपनी स्वास्थ्य-समस्या के बावजूद नीतीश कुमार फिर से मुख्यमंत्री बनने को इच्छुक बताये जाते हैं। अगर भारतीय जनता पार्टी को जनता दल-यू के मुकाबले काफी ज्यादा सीटें नहीं मिलतीं तो नीतीश कुमार मुख्यमंत्री के चयन की प्रक्रिया में पेंच ज़रूर डालेंगे। 

2020 के चुनाव में भाजपा नेतृत्व ने नीतीश कुमार को लगभग निपटा ही दिया था। अपने आप को प्रधानमंत्री मोदी का ‘हनुमान’ कहने वाले लोजपा (राम विलास) के नेता चिराग पासवान एनडीए का हिस्सा होते हुए भी अलग होकर चुनाव लड़े। उनकी पार्टी ने जनता दल-यू के उम्मीदवारों के खिलाफ अपने उम्मीदवार उतार दिये। नीतीश कुमार फौरन इस खेल को समझ गये। उन्होंने चिराग पासवान के खिलाफ कार्रवाई करने की मोदी-शाह से मांग की। पर ऐसा कुछ नहीं हुआ और चिराग पासवान की पार्टी के उम्मीदवार मैदान में बने रहे। चिराग ने कहा कि वह एनडीए से अलग होकर चुनाव लड़ रहे हैं। भाजपा नेतृत्व ने उनके विद्रोह को योजना के तहत नजरंदाज किया क्योंकि योजना तो उन्होंने ही बनाई थी ताकि नीतीश कुमार का कद छोटा किया जा सके। भाजपा की इस योजना का मनमाफिक नतीजा भी निकला। 

हर बार भाजपा से ज्यादा सीटें पाने वाले जनता दल-यू को उक्त चुनाव में महज 43 सीटें मिलीं जबकि भाजपा को 74 मिलीं। बाकी कुछ सीटें एनडीए में शामिल छोटे दलों को मिली थीं। भाजपा चाहती तो अपना मुख्यमंत्री उस वक्त भी बना सकती थी। नतीजा आने के बाद नीतीश कुमार ने राजनैतिक विनम्रता दिखाते हुए प्रधानमंत्री मोदी से कहा भी कि अब आप लोग अपने दल से किसी को मुख्यमंत्री बना लीजिये। लेकिन भाजपा नेतृत्व को मालूम था कि जनता दल-यू की भले ही कम सीटें हैं, नीतीश कुमार का और अब भी बहुत बड़ा है।

जनता दल-यू पूरी तरह एकजुट है। ऐसी स्थिति में भाजपा का कोई भी बिहारी नेता मुख्यमंत्री के रूप में कारगर नहीं हो पायेगा। नीतीश कुमार किसी क्षण सरकार गिराकर तेजस्वी यादव की तरफ चले जायेंगे। दिलचस्प ये कि 2020 के चुनाव में तेजस्वी की अगुवाई वाले राष्ट्रीय जनता दल को 75 सीटें मिली थीं। उसके गठबंधन सहयोगियों-कांग्रेस को 19 और भाकपा(माले) को 12 सीटें मिलीं। राजद विधानसभा में सबसे बड़ा दल बनकर उभरा था। फिर भी उसकी सरकार नहीं बनी। चुनाव-पूर्व गठबंधन की दलील देकर राज्यपाल ने भाजपा-जद-यू को ही सरकार बनाने का आमंत्रण दिया। 

तब से अब तक बीते पांच सालों में भाजपा-जद(यू) गठबंधन की अंदरुनी संरचना और समीकरणों में काफी कुछ बदला है। भाजपा नेतृत्व ने स्वास्थ्य कारणों से कमजोर होते नीतीश कुमार की हालत का फायदा उठाकर उन्हें राजनीतिक रूप से क्रमश: कमजोर किया है। पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा, केंद्र में कैबिनेट मंत्री राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह, अशोक चौधरी और विजय कुमार चौधरी जैसे नेताओं के जरिये जनता दल-यू में एक भाजपा-पक्षी खेमा तैयार कर लिया है। बिहार की राजनीति के जानकार मानते हैं कि जनता दल-यू के अंदर विजेंद्र यादव, श्रवण कुमार और नरेंद्र नारायण यादव जैसे कुछ ही बडे नेता हर परिस्थिति में नीतीश कुमार का साथ देंगे। बाकी अनेक मंत्री और विधायक जरूरत पड़ने पर नीतीश का साथ छोड़कर भाजपा-मय होना स्वीकार कर लेंगे। 

ऐसी परिस्थिति में भाजपा नेतृत्व आज आत्म-विश्वास से भरा हुआ है! 2020 जैसी स्थिति नहीं है, जब कम सीटें होने के बावजूद नीतीश कुमार राजनीतिक और सांगठनिक रूप से काफी मजबूत थे। तनिक सी तौहीन और अपनी राजनीतिक अनदेखी से नाराज होकर उन्होंने भाजपा नेतृत्व को अपनी हैसियत भी दिखा दी। अगस्त, 2022 में उन्होंने भाजपा को छोड़कर राष्ट्रीय जनता दल से हाथ मिलाया और नयी सरकार बना ली। यह अलग बात है कि 2022-23 में जब उनकी पार्टी के कुछ बड़े नेताओं, मंत्रियों और निकटस्थ उच्चाधिकारियों पर केंद्रीय एजेंसियों का ऑपरेशन शुरू हुआ तो वह फिर 2024 के शुरू में भाजपा की तरफ पलट गये।

2009 में एनडीए की लुधियाना चुनाव रैली के मंच पर गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी का हाथ झटकने वाले नीतीश कुमार 2024 से अब तक विभिन्न सार्वजनिक मंचों पर खुलेआम प्रधानमंत्री मोदी का पैर छू चुके हैं। बार-बार वह प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा के अन्य नेताओं को भरोसा देते नज़र आते हैं, ‘अब कभी हम आपका साथ नहीं छोड़ेगे!’ यही असलियत भी है। नीतीश कुमार अब भाजपा नेतृत्व के सामने स्थायी रूप से नतमस्तक हैं। इसलिए भाजपा के लिए यह मौका मुफीद है। अगर इस चुनाव में एनडीए को बहुमत मिलेगा तो नया मुख्यमंत्री भाजपा का होगा। बिहार में अब तक भाजपा अपनी अगुवाई में कभी सरकार नहीं बना पाई। इस बार वह नीतीश को हटाकर अपना पुराना सपना साकार करना चाहेगी! लेकिन यह सब कुछ चुनाव नतीजे पर निर्भर करेगा!

(उर्मिलेश लेखक और वरिष्ठ पत्रकार हैं।) 

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